यदि बच्चों के रहते माता-पिता वृद्धाश्रम में हों… तो जरा सोचिए

यदि बच्चों के रहते माता-पिता वृद्धाश्रम में हों… तो ऐसे बच्चों का जीवन कष्टों से भरा होगा अमिताभ बच्चन की फिल्म बागबान से बड़ा उदाहरण भला क्या हो सकता है जरा सोचिए JMS न्यूज़ आप तक BY लखन गुरु M 9425019321
भारतीय रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा संचालित वृद्धाश्रम सागर में तेजस संस्था व सागर के सामाजिक कार्यकर्ता की ओर से कंबल वितरण
सागर :-“बच्चो के रहते माता पिता वृद्धाश्रम में चले आते है”
लेकिन
“माता पिता के रहते बच्चे कभी अनाथालय में नही जाते है”
कहते है मानवसेवा ही ईश्वरीय सेवा है ये सत्य है ईश्वर अगर कोई है तो बच्चो को जन्म देने वाले माता पिता है । मध्य प्रदेश राज्य के सागर जिले में बने वृद्धाश्रम में तेजस संस्था के अध्यक्ष चंद्रशेखर अरगुलेवार सागर जिले के सामाजिक कार्यकर्ता व तेजस संस्था के सागर जिले में कार्य करने वाले धोबी समाज की बुलन्द आवाज संतोष रजक के बुलावे पर अरगुलेवार कंबल लेकर आज दिनांक 23 जनवरी 2026 को सागर पहुचे सागर के वृद्धाश्रम में संतोष रजक , प्रहलाद रजक , चंद्रशेखर अरगुलेवार ने स्वइच्छा से खरीदे कंबल को क्रांतिकारी अमर शहीद चंद्रशेखर आजद के सच्चे मित्र व आजाद की माँ की अंतिम साँसो तक सेवा करने वाले अंतिम संस्कार करने वाले क्रांतिकारी सदाशिवराव मलकापुरकर के भतीजे हेमंतराव मलकापुरकर व सागर के धोबी समाज के वरिष्ठ गण डालचंद रजक , देवीप्रसाद रजक , गोपाल रजक , वृद्धाश्रम के प्रबन्धक अवदेश कुमार , देवेन्द्र सैन की उपस्थिति में 40 कंबल वृद्धाश्रम में रहने वाले वृद्ध को वितरण किया कंबल को लेते समय वृद्धों के आखों मे खुशी के आंसू निकल पड़े सभी वृद्धों ने चंद्रशेखर अरगुलेवार , संतोष रजक , प्रहलाद रजक पर अन्य सम्मानीय गणो को आशीर्वाद दिया इस दृश्य में संतोष रजक चंद्रशेखर अरगुलेवार के आखों से भी आँसू झलक पड़े , सामाजिक कार्यकर्ता संतोष रजक व सागर धोबी समाज की ओर से चंद्रशेखर अरगुलेवार को देश का तिरंगा झंडा देकर सम्मानित किया ।
जिस घर में कभी माँ-बाप ने अपनी ज़रूरतें भूलकर बच्चों की हर चाह पूरी की, आज उसी घर के दरवाज़े उनके लिए बंद हों—तो यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, हमारे समाज का आईना है। बच्चों के रहते हुए माता-पिता का वृद्धाश्रम जाना मजबूरी भी हो सकती है, लेकिन अक्सर यह हमारी प्राथमिकताओं और संवेदनाओं पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
व्यस्त ज़िंदगी, नौकरी का दबाव, शहरों की दूरी—ये सब कारण बताए जाते हैं। पर क्या रिश्तों की ज़िम्मेदारी समय की कमी से छोटी हो जाती है? माता-पिता की देखभाल केवल सेवा नहीं, संस्कारों की परीक्षा है। वृद्धाश्रम सुविधाएँ दे सकता है, पर अपनापन नहीं।
आज ज़रूरत है कि हम सहानुभूति और संवाद को फिर से घर लौटाएँ—क्योंकि कल हम भी उसी आईने के सामने खड़े होंग । टीम JMS न्यूज़ आप तक