वंचितों का उठना सवर्णों का गिरना नहीं, फिर भय क्यों?

समानता का विचार जितना सुंदर लगता है, व्यवहार में उतना ही असहज होता है—ख़ासकर उनके लिए, जिन्होंने असमानता को कभी समस्या ही नहीं माना। जब यूजीसी जैसे संस्थान विश्वविद्यालयों में पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए नियम बनाते हैं, तो विरोध केवल नियमों का नहीं होता; वह उस मानसिक ढाँचे का होता है, जिसमें सदियों से चली आ रही सुविधा को ‘स्वाभाविक’ मान लिया गया है।

यह दृश्य हमें केवल भारतीय समाज तक सीमित नहीं दिखता। यदि दृष्टि को थोड़ा और फैलाएँ, तो यही संघर्ष अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी दिखाई देता है—जहाँ अमेरिका खड़ा है शक्ति और विशेषाधिकार के केंद्र में, और भारत जैसे देश संघर्षरत हैं बराबरी की जगह बनाने के लिए। यही वह बिंदु है जहाँ सवर्ण समाज और अमेरिका एक रूपक में आपस में जुड़ जाते हैं।

अमेरिका ने वैश्विक राजनीति में वह स्थान यूँ ही नहीं पाया। औद्योगिक क्रांति, पूँजी, तकनीक और सैन्य शक्ति—इन सबने उसे पहले से आगे खड़ा कर दिया। ठीक वैसे ही जैसे भारतीय समाज में सवर्ण वर्ग को शिक्षा, ज्ञान और सत्ता तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहज पहुँच मिलती रही। यह बढ़त मेहनत का परिणाम भर नहीं थी; यह इतिहास द्वारा दी गई सुविधा थी। पर इतिहास की यही देन, आगे चलकर नैतिक श्रेष्ठता का दावा बन जाती है।

सत्ता का एक नियम है—जो ताक़तवर होता है, वही नियम बनाता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ हों या विश्वविद्यालयों की अकादमिक समितियाँ, नियम प्रायः उन्हीं के हित में गढ़े जाते हैं, जिनकी आवाज़ पहले से मजबूत होती है। जब ये नियम बदलने लगते हैं, जब बराबरी की भाषा सत्ता के कक्षों तक पहुँचती है, तब एक बेचैनी जन्म लेती है। अमेरिका को तब ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ के टूटने का डर सताने लगता है, और सवर्ण समाज को ‘योग्यता’ के पतन का।

यहाँ ‘योग्यता’ और ‘merit’ जैसे शब्द केवल बौद्धिक अवधारणाएँ नहीं रह जाते; वे सत्ता की रक्षा के औज़ार बन जाते हैं। जैसे अमेरिका मुक्त बाज़ार और समान नियमों की बात करता है, वैसे ही सवर्ण समाज ‘सबके लिए एक जैसे अवसर’ का तर्क देता है। पर दोनों ही स्थितियों में एक प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है—क्या असमान प्रारंभ बिंदु वाले लोगों के लिए समान नियम न्यायपूर्ण हो सकते हैं?

भारत, इस रूपक में, पिछड़े-दलित-आदिवासी समाज की तरह खड़ा दिखाई देता है। इतिहास की मार झेलता हुआ, संसाधनों से वंचित, और फिर भी बार-बार अपनी ‘क्षमता’ साबित करने को बाध्य। जब भारत वैश्विक मंच पर न्याय, जलवायु वित्त या पेटेंट कानूनों की बात करता है, तो उससे पहले उसकी परीक्षा ली जाती है। ठीक वैसे ही जैसे विश्वविद्यालयों में वंचित समुदायों से कहा जाता है—पहले साबित करो कि तुम योग्य हो, फिर अधिकार माँगो।

यह परीक्षा कभी समाप्त नहीं होती। अधिकार माँगना यहाँ अपराध बन जाता है, और अन्याय को स्वीकार कर लेना ‘शालीनता’। यूजीसी के नियम इसी शालीन असमानता को तोड़ने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं कि संस्थान केवल ज्ञान के मंदिर नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाएँ भी हैं—और यदि उनमें भेदभाव है, तो उसका समाधान भी वहीं से शुरू होना चाहिए।

विरोध करने वालों का तर्क अक्सर व्यक्तिगत नैतिकता पर टिकता है—“हम भेदभाव नहीं करते।” पर समस्या व्यक्ति की नहीं, संरचना की होती है। अमेरिका का कोई नागरिक व्यक्तिगत रूप से शोषक न हो, फिर भी उसकी वैश्विक सत्ता असमानता पैदा करती है। उसी तरह कोई सवर्ण शिक्षक व्यक्तिगत रूप से उदार हो सकता है, फिर भी जिस व्यवस्था में वह काम कर रहा है, वह भेदभाव को पुनरुत्पादित करती रहती है।

समानता का वास्तविक अर्थ अवसरों की साझेदारी नहीं, बल्कि सत्ता के पुनर्वितरण में छिपा है। यही कारण है कि समानता की बात सबसे ज़्यादा असहज करती है। वह केवल जगह नहीं माँगती; वह कुर्सी खिसकाने की माँग करती है। और कुर्सी खिसकाना इतिहास में शायद ही कभी सहज रहा हो।

अंततः यूजीसी के नियमों का प्रश्न प्रशासनिक नहीं, सभ्यतागत है। यह प्रश्न पूछता है—क्या हम ज्ञान के क्षेत्र को भी लोकतांत्रिक बना पाए हैं? क्या हम उस बराबरी के लिए तैयार हैं, जिसमें किसी का उठना किसी के गिरने का भय न बने?

जब तक इस प्रश्न का सामना ईमानदारी से नहीं किया जाता, तब तक अमेरिका और भारत की दूरी भी बनी रहेगी, और सवर्ण व वंचित समाजों के बीच का संघर्ष भी। क्योंकि समस्या नियमों में नहीं, उस मनःस्थिति में है, जो नियम बदलते ही असुरक्षित हो जाती है।

और शायद यही समानता की सबसे बड़ी परीक्षा है।

विकास पाल

शोधार्थी, MJPRU, बरेली

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